Wednesday, September 30, 2020

 

अदाओं पे उनकी हम पागल हो चुके थे
कभी बरसने वाला बादल हो चुके थे

नज़रो कि तिर से घायल हो चुके थे
बस उनके पैरों की पायल हो चुके थे

गैर कश्ती को मिलनेवाला साहिल हो चुके थे
हम खुद ही दिलके अपने कातिल हो चुके थे

रात की खामोशी के संगेदिल हो चुके थे
उन्हें दिल देकर हम बे-दिल हो चुके थे।।

@कमल नूहिवाल " धरमवीर "


 

 

इस क़दर भी खंजर चलाओ दिलपे

की मिरे इख़्तिताम पर  आब--दरिया सुर्ख हो जाये ...

 

 

@कमल नूहिवाल "धरमवीर"

 


 


 

ज़रा आहिस्ते डालो साक़ी शहद--शराब पैमाने में

हम तो ज़हर पीकर भी बख़ूबी ज़िंदा हैं इक ज़माने से।।

 

@कमल नूहिवाल "धरमवीर"

अहल-ए-दिल -

 

 
खुद को ना यूँ  समझ खुदा तू  खेल ना अब अंगारों से

हुआ कहीं जो पलभर ग़ाफ़िल ख़ाक बने चिंगारो से।।  

 

कपट भरी फ़नकारी तेरी उलझ ना यूँ फ़नकारों से

गज़ब हौसला अटल इरादें  मिलते बस खुद्दारों में।।

 

सुबह का सूरज छुपा हुआ है शब के इन अँधियारों में

बन नहीं सकता क़ाफ़िर तू जो साथ मिला ग़द्दारों के।। 

 

बाज़ार जग  है तू भी खड़ा है ज़ख्मों के खरीदारों में

"धरम" कहाँ बिकता है लेकिन मौला के दरबारों  में।।

 

नज़र नज़र का धोखा ये जग खोकर देख नज़ारों  में

तुझसे बढ़कर फ़क़ीर न होगा क़र्या क़र्या हज़ारों में।।

 

ज़ख़्म-ए-जिगर बना है  मिरा क़िस्मत की लकीरों से

ख़ाक-बसर मैं दो पल जी लूँ अमीरों की तकदीरों से।।

 

ना तुन्द-हवा तुफ़ाओं से और  हक़ूमत की शमशीरों से

अहल-ए-दिल कहाँ झुके हैं यारो बंदूकें और जंजीरों से।।

 

@कमल नूहिवाल "धरमवीर"